Tuesday, January 11, 2011

Couldn't give it a tittle

जीवन से इतना प्रेम भी नही,
की मरने का डार हो,
जीवन में इतना ज्ञान भी नही,
की जीवित होने का आभास हो!

जहाँ गया खामोशी, शांति को ढूंढ़ते हूऐ,
आंतरिक शोर को भूल गया मैं,
भूला नही हूं,
बस भूलने की चाह में घूमता हूं मैं!

इतना कुछ पढ़ता हूं, गुरु से,
विवाद कर सकता हूं मैं,
ख़ुद से विवाद और अज्ञानता में,
हर रोज़ हारता हूं मैं !

Friday, January 7, 2011

Trying my hand at Poetry

Wrote these poems a couple of months back, thought of putting them on blog in the new year!
व्यक्ति
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हर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व
के गहरे और उथले पन से
औरों के व्यक्तित्व को
आंकता है!

हर शब्द, हर वाक्य को
तोल मोल के
अपने ही मस्तिक्ष मैं एक अर्थ एक पराया देकर
उसे कटाक्ष और टिपण्णी का रूप दे देता है!

हर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व
के गहरे और उथले पन से
औरों के व्यक्तित्व को
आंकता है!

किसी रिश्ते को जीवन
जीने का कारण बनाता है
कुछ और रिश्तों की श्रंकला को तोड़ कर,
उन्ही रिश्तों मे
अपने को ढूँढता और खो देता है !

हर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व
के गहरे और उथले पन से
औरों के व्यक्तित्व को
आंकता है!

ऐश्वर्य, अहम्,अहंकार और सम्मान
के पीछे सारा जीवन व्यतीत करके
जीवन संध्या मे
क्या खोया क्या पाया हिसाब करता है !

हर व्यक्ति अपने व्यक्तित्व
के गहरे और उथले पन से
औरों के व्यक्तित्व को
आंकता है!

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विचार
उसने कहा समय के गर्भ में,
पनपते हैं विचार , अविष्कार,
मेरे उदासीन देमाग ने एक नज़र नज़र उसकी ओर देख कर सोचा,
क्यूँ अभी तक इतनी उतेजना है इसमें!



विचारों का क्या, हर रोज़ चले आते हैं,
क्या मिला है इन विचारों से मुझे,
विचारों का क्या, रोज़ ले जाते हैं मुझे,
हर उस जगह जहाँ जाना नहीं है मुझे!

विचारों का क्या, हर रोज़ एक नयी उमंग से,
लाते हैं एक नयी उम्मीद एक नयी सम्भावन,
विचारों का क्या, शोर माचाते हैं,
मस्तिष्क की दीवारों से टकरा कर चूर जो जाते हैं!

अचानक एक आवाज़ दूर नहीं पास कहीं से बोली ,
विचारों का नहीं है शोर,
शोर तो तुम मचा रहे हो ,
विचारों से युद्ध लढ़ के!


उदासीन देमाग नहीं है तुम्हरा,
उदासीन विचोअरों को पाल रहे हो तुम आपने समय में
उसने फिर कहा , समय के गर्भ में
पनपते हैं विचार , अविष्कार !

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